CHANDAMAMA | चन्दामामा |

अगर आपकी उम्र 25 से कम है तो हो सकता है कि आपने ‘चन्दामामा’ CHANDAMAMA का नाम भी न सुना हो। अगर आप 30 या उससे अधिक के हैं और अपने बचपन में बाल साहित्य के शौक़ीन रहे हैं या ऐसे अद्भुत परिवार में पले-बढ़े हैं जहां children’s magazine आती रही हैं, तब आपने ‘चन्दामामा’ ज़रूर पढ़ी होगी। पढ़ी नही होगी तो इस “जादुई दुनिया” का नाम तो सुना ही होगा।

आर्टिस्ट KC SIVASANKAR जी का 97 साल की उम्र में निधन हो गया। वो ‘चन्दामामा’ मैगज़ीन के चित्रों को 60 सालों तक सजीव बनाते रहे। उन सभी काल्पनिक पात्रों में अपनी कूची से जान फूंकते रहे। वो न सिर्फ़ ‘चन्दामामा CHANDAMAMA’ की ओरिजिनल टीम के अंतिम जीवित सदस्य थे बल्कि भारत देश में बाल पत्रिकाओं से जुड़े सबसे प्रतिभाशाली और अनुभवी लोगों में से भी एक थे।

CHANDMAMA
K C SIVASANKAR
VIKRAM AUR BETAAL
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CHANDAMAMA |VIKRAM AUR BETAAL |

उनका बनाया आइकोनिक और अविस्मरणीय चित्र “विक्रम और बेताल ” का वो चित्र है जिसमें राजा विक्रमादित्य के हाथ में तलवार है और पीठ पर बेताल लदा हुआ है। इस चित्र को कैसे भुलाया जा सकता है।

गवर्मेंट आर्ट कॉलेज से 1946 में पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होने एक तमिल मैगज़ीन में काम किया।  1951 में वो नागी रेड्डी की मैगज़ीन ‘अम्बुलिमामा’ के लिए काम करने लगे। ‘अम्बुलिमामा’ का हिंदी संस्करण ही ‘ चन्दामामा’ है जिसे पढ़कर मुझ जैसे नाचीज़ भी कल्पनालोक में विचरते रहते थे।

चित्रों के डीटेल देखिए। जैसे एक-एक बिंदु विचार और प्रयास से रखा गया है। ये उस दर्जे का डेडिकेशन है जिसके बारे में शायद हमारी पूरी पीढ़ी न सोच पाए। सोचिए बाल पाठकों का भी क्या मानसिक विकास होता होगा इतना अच्छा साहित्य पढ़कर और कला का इतना उच्चस्तरीय स्वरुप देखकर। चंदामामा CHANDAMAMA टीम के ऐसे कालजयी प्रयास के लिए, 3 पीढ़ियां उनकी ऋणी ( indebted ) हैं। 

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नागी रेड्डी जी और चक्रपाणि जी की दूरदर्शिता, प्रतिबद्धता और पाठकों ( प्रसन्नता के साथ कहना होगा,,, बाल पाठकों ) की समझ ने ‘चन्दामामा ‘ को वो प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा दिलाई। एक विशाल और प्रतिभाशाली टीम 6 दशकों ( 6 decades ) तक साथ काम करती रही।

तमिल और तेलुगु भाषा में ‘अम्बुलिमामा’ का प्रथम संस्करण जुलाई 1947 में प्रकाशित किया गया। 1949 में हिंदी संस्करण आया। 12 भारतीय भाषाओं ( बंगाली, असामी, पंजाबी, संस्कृत व अन्य ) और इंग्लिश में प्रकाशित होने वाली इस बेहतरीन मैगज़ीन की लोकप्रियता का आज भी आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है।

निःसंदेह ‘चन्दामामा ‘ में प्रकाशित होने वाली कहानियां और चित्रकथाएं श्रेष्ठतम में से एक हुआ करती थीं। ‘चन्दामामा ‘ एक कॉमिक बुक न होकर एक बाल पत्रिका थी। इसकी एक विशेषता ये थी कि हर पृष्ठ पर कोई न कोई चित्र अवश्य होता था।

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मूल पत्रिका का एक पृष्ठ

इन चित्रों से बाल पाठकों को ऐसा मोह हो जाता था कि हमारे नौनिहाल ( मतलब तब के नौनिहाल ) इसे संभालकर कर रखते थे। एक ही पत्रिका को कई-कई बार पढ़ने का कारनामा मैने भी बचपन में ख़ूब किया। हमारा बचपन, बचपन था। जो मन किया, उसी में रमे रहते।

‘चन्दामामा ‘ की इस बेहतरीन टीम में एम टी वी आचार्य जी, टी राघवन जी, वापा जी, केसव जी, एम गोखले जी और सिवसंकर ( संकर ) जी जैसे महारथी थे। शुरुआती समय में इसके मुख पृष्ठ ( cover ) में 4 रंग होते थे। 90 के दशक में जब मै इसे पढ़ता था, तकनीकि विकास की बदौलत इसमें रंगों की सरिता बहा करती थी।

CHANDAMAMA ONLINE

2006 में ऐसा समाचार प्राप्त हुआ कि DISNEY इसमें कुछ भागीदारी करना चाहती है। 2007 में इसे ऑनलाइन पोर्टल में लाने के प्रयास भी हुए। 2013 में फेसबुक के ऑफ़िशियल पेज से जानकारी दी गई कि पब्लिशिंग कुछ समय के लिए बंद की जा रही है।

कुछ समय बाद ‘चन्दामामा’ की आधिकारिक वेबसाइट ( CHANDAMAMA OFFICIAL WEBSITE ) भी बंद हो गई। ‘चन्दामामा ‘ के प्रशंसक ( fans ) ज़रूर एक पेज रन करते हैं जहां आप निःशुल्क पुरानी प्रतियां पढ़कर, यादों के गलियारों में चहलकदमी कर सकते हैं।  link –https://www.chandamama.in/promotion/

IMROZ FARHAD

2 thoughts on “CHANDAMAMA | चन्दामामा |

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